Monday, November 20, 2017

दूर रह कर हमेशा हुए फासले

दूर रह कर हमेशा हुए फासले ,चाहें रिश्तें कितने क़रीबी  क्यों ना हों
कर लिए बहुत काम लेन देन  के ,विन  मतलब कभी तो जाया करो

पद पैसे की इच्छा बुरी तो नहीं मार डालो जमीर कहाँ ये सही
जैसा देखेंगे बच्चे वही सीखेंगें ,पैर अपने माँ बाप के भी दबाया करो

काला कौआ भी है काली कोयल भी है ,कोयल सभी को भाती  क्यों है
सुकूँ दे चैन दे दिल को ,अपने मुहँ में ऐसे ही अल्फ़ाज़ लाया करो

जब सँघर्ष है तब ही  मँजिल मिले ,सब कुछ सुबिधा नहीं यार जीबन में है
जिस गली जिस शहर में चला सीखना , दर्द उसके मिटाने भी जाया करो

यार जो भी करो तुम सँभल करो ,  सर उठे गर्व से ना झुके शर्म से
वक़्त रुकता है किसके लिए ये "मदन" वक़्त ऐसे ही अपना ना जाया करो


दूर रह कर हमेशा हुए फासले

मदन मोहन सक्सेना

Tuesday, November 7, 2017

बक्त कब किसका हुआ जो अब मेरा होगा


बक्त कब किसका हुआ जो अब मेरा होगा
बुरे बक्त को जानकर सब्र किया मैनें

किसी को चाहतें रहना कोई गुनाह तो नहीं
चाहत का इज़हार न करने का गुनाह किया मैंने

रिश्तों की जमा पूंजी मुझे बेहतर कौन जानेगा
तन्हा रहकर जिंदगी में गुजारा किया मैंने

अब तू भी है तेरी यादों की खुशबु भी है
दूर रहकर तेरी याद में हर पल जिया मैनें

दर्द मुझसे मिलकर अब मुस्कराता है
जब दर्द को दबा जानकार पिया मैंने


बक्त कब किसका हुआ जो अब मेरा होगा


मदन मोहन सक्सेना

Thursday, October 12, 2017

तुम्हारा साथ जब होगा नजारा ही नया होगा







तुम्हारी याद जब आती तो मिल जाती ख़ुशी हमको
तुमको पास पायेंगे तो मेरा हाल क्या होगा

तुमसे दूर रह करके तुम्हारी याद आती है
मेरे पास तुम होगें तो यादों का फिर क्या होगा

तुम्हारी मोहनी सूरत तो हर पल आँख में रहती
दिल में जो बसी सूरत उस सूरत का फिर क्या होगा

अपनी हर ख़ुशी हमको अकेली ही लगा करती
तुम्हारा साथ जब होगा नजारा ही नया होगा

दिल में जो बसी सूरत सजायेंगे उसे हम यूँ
तुमने उस तरीके से संभारा भी नहीं होगा



तुम्हार साथ जब होगा नजारा ही नया होगा


मदन मोहन सक्सेना

Monday, October 9, 2017

भरोसा टूटने पर यार सब कुछ टूट जाता है

भरोसा टूटने पर यार सब कुछ टूट जाता है


भरोसा है तो रिश्तें हैं ,रिश्तें हैं तो खुशहाली
भरोसा टूटने पर यार सब कुछ टूट जाता है

यारों क्यों लगा करतें हैं दुश्मन जैसे अपने भी
किसी के यार जीबन में समय जब रूठ जाता है

समय की माँग है यारों रिश्तों को समय देना
अनदेखी में लगाया पौधा अक्सर सूख जाता है

बुरा कोई नहीं होता बुरे हालात होते हैं
दो पैसों के खातिर अपनों का साथ छूट जाता हैं

गज़ब हैं लोग दुनिया के गज़ब हैं रंग दुनिया के
जिसकी जब जरुरत हो तब ही रूठ जाता है

समय के साथ चलना क्यों बहुत मुश्किल हुआ करता
मदन जीबन यार बुलबुला है आखिर फूट जाता है


मदन मोहन सक्सेना

Friday, September 29, 2017

तुम भक्तों की रख बाली हो

तुम भक्तों की रख बाली हो ,दुःख दर्द मिटाने  बाली हो
तेरे चरणों में मुझे जगह मिले अधिकार तुम्हारे हाथों में


नब रात्रि में भक्त लोग माँ दुर्गा के नौ स्वरूप की पूजा अर्चना करके माँ का आश्रिबाद  प्राप्त करतें है।
पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है।
वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्।।


मां दुर्गा की नव शक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है.
दधानां करपद्माभ्यामक्ष मालाकमण्डलू.
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा..
यहां ब्रह्मशब्द का अर्थ तपस्या है.


मां दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चन्द्रघण्टाहै.
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैयरुता.
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता..
मां दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चन्द्रघण्टाहै. नवरात्र उपासना में तीसरे दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है.

मां दुर्गाजी के चौथे स्वरूप का नाम कूष्माण्डा है।
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।।
अपनी मन्द , हलकी हंसी द्वारा अण्ड अर्थात् ब्रहृाण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से अभिहित किया गया है।
मां दुर्गाजी के पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है।
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।
ये भगवान् स्कन्द 'कुमार कात्र्तिकेय' की माता  है। इन्हीं भगवान् स्कन्द की माता होने के कारण मां दुर्गा जी के इस पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है।



मां दुर्गा के छठवें स्वरूप का नाम कात्यायनी है।
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवद्यातिनी।।
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।
प्रसिद्ध महर्षि कत के पुत्र ऋषि कात्य के गोत्र में महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। उन्होंने भगवती पराम्बा की घोर उपासना की और उनसे अपने घर में पुत्री के रूप में जन्म लेने का आग्रह किया। कहते हैं, महिषासुर का उत्पात बने पर ब्रहृा, विष्णु, महेश तीनों के तेज के अंश से देवी कात्यायनी महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई थीं।

नवरात्र के सातवें दिन आदिशक्ति मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की उपासना की जाती है.  
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।
मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं. इसी कारण इनका एक नाम 'शुभंकरी' भी है.दुर्गा पूजा के सातवें दिन मां कालरात्रि की आराधना का विधान है.

मां दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। इनका वर्ण पूर्णत: गौर है।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा।।
इस गौरता की उपमा शंख, चन्द्र और कुन्द के फूल से दी गयी है। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गयी है।

मां दुर्गाजी की नवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है।
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। मार्कण्डेयपुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व-ये आठ सिद्धियां होती हैं।नवरात्र-पूजन के नवें दिन इनकी उपासना की जाती है।नव दुर्गाओं में मां सिद्धिदात्री अन्तिम हैं।


Monday, September 18, 2017

ग़ज़ल (दोस्त अपने आज सब क्यों बेगाने लगतें हैं)


ग़ज़ल (दोस्त अपने आज सब क्यों बेगाने  लगतें हैं)



जब अपने चेहरे से नकाब हम हटाने लगतें हैं
अपने चेहरे को देखकर डर जाने लगते हैं


वह  हर बात को मेरी क्यों दबाने लगते हैं
जब हकीकत हम उनको समझाने लगते हैं


जिस गलती पर हमको वह  समझाने लगते है
वही  गलती को फिर वह  दोहराने लगते हैं


आज दर्द खिंच कर मेरे पास आने लगतें हैं
शायद दर्द से मेरे रिश्ते पुराने लगतें हैं


दोस्त अपने आज सब क्यों बेगाने  लगतें हैं
मदन दुश्मन आज सारे जाने पहचाने लगते हैं 

ग़ज़ल (दोस्त अपने आज सब क्यों बेगाने  लगतें हैं)
मदन मोहन सक्सेना

Wednesday, September 13, 2017

जय हिंदी जय हिंदुस्तान मेरा भारत बने महान






हिंदी दिवस की अग्रिम शुभ कामनायें


गंगा यमुना सी नदियाँ हैं जो देश का मन बढ़ाती हैं
सीता सावित्री सी देवी जो आज भी पूजी जाती हैं


यहाँ जाति धर्म का भेद नहीं सब मिलजुल करके रहतें हैं
गाँधी सुभाष टैगोर तिलक नेहरु का भारत कहतें हैं

यहाँ नाम का कोई जिक्र नहीं बस काम ही देखा जाता है
जिसने जब कोई काम किया बह ही सम्मान पाता है

जब भी कोई मिले आकर बो गले लगायें जातें हैं
जन आन मान की बात बने तो शीश कटाए जातें हैं

आजाद भगत बिस्मिल रोशन बीरों की ये तो जननी है
प्रण पला जिसका इन सबने बह पूरी हमको करनी है

मथुरा हो या काशी हो चाहें अजमेर हो या अमृतसर
सब जातें प्रेम भाब से हैं झुक जातें हैं सबके ही सर.
 
जय हिंदी जय हिंदुस्तान मेरा भारत बने महान

मदन मोहन सक्सेना

Thursday, September 7, 2017

साहित्य पीडिया , मैं और प्यार के बोल





प्यार तो है सबसे परे ,ना उसका कोई चेहरा है
रहमते खुदा की जिस पर सर उसके बंधे सेहरा है
प्यार ने तो जीबन में ,हर पल खुशियों को बिखेरा है
ना जाने ये मदन ,फिर क्यों लगे प्यार पे पहरा है
http://wp.me/p7uU2K-D1

मदन मोहन सक्सेना

बहुत मुश्किल है ये कहना किसने खेल खेला है
उधर तन्हा अकेली तुम, इधर ये दिल अकेला है
पाकर के तन्हा मुझको उदासी पास आती है
सुहानी रात मुझको अब नागिन सी डराती है
http://wp.me/p7uU2K-Ep
मदन मोहन सक्सेना



अनोखा प्यार का बंधन इसे तुम तोड़ ना देना
पराया जान हमको अकेला छोड़ ना देना
रहकर दूर तुमसे हम जियें तो बो सजा होगी
ना पायें गर तुम्हें दिल में तो ये मेरी सजा होगी
http://wp.me/p7uU2K-En



नज़रों ने नज़रों से नजरें मिलायीं
प्यार मुस्कराया और प्रीत मुस्कराई
प्यार के तराने जगे गीत गुनगुनाने लगे
फिर मिलन की ऋतू आयी भागी तन्हाई
 प्यार तो है सबसे परे ,ना उसका कोई चेहरा है
रहमते खुदा की जिस पर सर उसके बंधे सेहरा है
प्यार ने तो जीबन में ,हर पल खुशियों को बिखेरा है
ना जाने ये मदन ,फिर क्यों लगे प्यार पे पहरा है
http://wp.me/p7uU2K-D1

मदन मोहन सक्सेना



बहुत मुश्किल है ये कहना किसने खेल खेला है
उधर तन्हा अकेली तुम, इधर ये दिल अकेला है
पाकर के तन्हा मुझको उदासी पास आती है
सुहानी रात मुझको अब नागिन सी डराती है
http://wp.me/p7uU2K-Ep
मदन मोहन सक्सेना


अनोखा प्यार का बंधन इसे तुम तोड़ ना देना
पराया जान हमको अकेला छोड़ ना देना
रहकर दूर तुमसे हम जियें तो बो सजा होगी
ना पायें गर तुम्हें दिल में तो ये मेरी सजा होगी
http://wp.me/p7uU2K-En
मदन मोहन सक्सेना

नज़रों ने नज़रों से नजरें मिलायीं
प्यार मुस्कराया और प्रीत मुस्कराई
प्यार के तराने जगे गीत गुनगुनाने लगे
फिर मिलन की ऋतू आयी भागी तन्हाई

प्यार तो है सबसे परे ,ना उसका कोई चेहरा है
रहमते खुदा की जिस पर सर उसके बंधे सेहरा है
प्यार ने तो जीबन में ,हर पल खुशियों को बिखेरा है
ना जाने ये मदन ,फिर क्यों लगे प्यार पे पहरा है
http://wp.me/p7uU2K-D1

मदन मोहन सक्सेना


बहुत मुश्किल है ये कहना किसने खेल खेला है
उधर तन्हा अकेली तुम, इधर ये दिल अकेला है
पाकर के तन्हा मुझको उदासी पास आती है
सुहानी रात मुझको अब नागिन सी डराती है
http://wp.me/p7uU2K-Ep
मदन मोहन सक्सेना

अनोखा प्यार का बंधन इसे तुम तोड़ ना देना
पराया जान हमको अकेला छोड़ ना देना
रहकर दूर तुमसे हम जियें तो बो सजा होगी
ना पायें गर तुम्हें दिल में तो ये मेरी सजा होगी
http://wp.me/p7uU2K-En
मदन मोहन सक्सेना


नज़रों ने नज़रों से नजरें मिलायीं
प्यार मुस्कराया और प्रीत मुस्कराई
प्यार के तराने जगे गीत गुनगुनाने लगे
फिर मिलन की ऋतू आयी भागी तन्हाई
मदन मोहन सक्सेना
http://wp.me/p7uU2K-Esm


दिल से फिर दिल का करार होने लगा
खुद ही फिर खुद से क्यों प्यार होने लगा
नज़रों ने नज़रों से नजरें मिलायीं
प्यार मुस्कराया और प्रीत मुस्कराई
 मदन मोहन सक्सेना
http://wp.me/p7uU2K-Esm



साहित्य पीडिया  , मैं और  प्यार के बोल
मदन मोहन सक्सेना

Monday, August 14, 2017

अर्थ का अनर्थ (अब तो आ कान्हा जाओ)

अर्थ का अनर्थ (अब तो आ कान्हा जाओ)
अब तो आ कान्हा जाओ, इस धरती पर सब त्रस्त हुए
दुःख सहने को भक्त तुम्हारे आज क्यों अभिशप्त हुए
नन्द दुलारे कृष्ण कन्हैया ,अब भक्त पुकारे आ जाओ
प्रभु दुष्टों का संहार करो और प्यार सिखाने आ जाओ
अर्थ का अनर्थ
एक रोज हम यूँ ही बृन्दावन गये
भगबान कृष्ण हमें बहां मिल गये
भगवान बोले ,बेटा मदन क्या हाल है ?
हमने कहा दुआ है ,सब मालामाल हैं
कुछ देर बाद हमने ,एक सवाल कर दिया
भगवान बोले तुमने तो बबाल कर दिया
सवाल सुन करके बो कुछ लगे सोचने
मालूम चला ,लगे कुछ बह खोजने
हमने उनसे कहा ,ऐसा तुमने क्या किया ?
जिसकी बजह से इतना नाम कर लिया
कल तुमने जो किया था ,बह ही आज हम कर रहे
फिर क्यों लोग , हममें तुममें भेद कर रहे
भगवान बोले प्रेम ,कर्म का उपदेश दिया हमनें
युद्ध में भी अर्जुन को सन्देश दिया हमनें
जब कभी अपनों ने हमें दिल से है पुकारा
हर मदद की उनकी ,दुष्टों को भी संहारा
मैनें उनसे कहा सुनिए ,हम कैसे काम करते है
करता काम कोई है ,हम अपना नाम करते हैं
देखकर के दूसरों की माँ बहनों को ,हम अपना बनाने की सोचा करते
इसी दिशा में सदा कर्म किया है, कल क्या होगा ,ये ना सोचा करते
माता पिता मित्र सखा आये कोई भी
किसी भी तरह हम डराया करते
साम दाम दण्डं भेद किसी भी तरह
रूठने से उनको मनाया करते
बात जब फिर भी नहीं है बनती
कर्म कुछ ज्यादा हम किया करतें
सजा दुष्टों को हरदम मिलती रहे
ये सोचकर कष्ट हम दिया करते
मार काट लूट पाट हत्या राहजनी
अपनें हैं जो ,मर्जी हो बो करें
कहना तो अपना सदा से ये है
पुलिस के दंडें से फिर क्यों डरे
धोखे से जब कभी बे पकड़े गए
पल भर में ही उनको छुटाया करते
जब अपनें है बे फिर कष्ट क्यों हो
पल भर में ही कष्ट हम मिटाया करते
ये सुनकर के भगबान कहने लगे
क्या लोग दुनियां में इतना सहने लगे
बेटा तुने तो अर्थ का अनर्थ कर दिया
ऐसे कर्मों से जीवन अपना ब्यर्थ कर दिया
तुमसे कह रहा हूँ मैं हे पापी मदन
पाप अच्छे कर्मों से तुमको डिगाया करेंगें
दुष्कर्मों के कारण हे पापी मदन
हम तुम जैसों को फिर से मिटाया करेंगें

मदन मोहन सक्सेना

Tuesday, May 16, 2017

तुमसे रब को पाने लगा आजकल हूँ

सपने सजाने लगा आजकल हूँ
मिलने मिलाने लगा आज कल हूँ
हुयी शख्शियत उनकी मुझ पर हाबी
खुद को भुलाने लगा आजकल हूँ


इधर तन्हा मैं था उधर तुम अकेले
किस्मत ,समय ने क्या खेल खेले
गीत ग़ज़लों की गंगा तुमसे ही पाई
गीत ग़ज़लों को गाने लगा आजकल हूँ


जिधर देखता हूँ उधर तू मिला है
ये रंगीनियों का गज़ब सिलसिला है

नाज क्यों ना मुझे अपने जीवन पर हो
तुमसे रब को पाने लगा आजकल हूँ





मदन मोहन सक्सेना